श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 227: इन्द्र और बलिका संवाद—काल और प्रारब्धकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक 92-93h
 
 
श्लोक  12.227.92-93h 
अहमप्येवमेवैनं लोकं जानाम्यशाश्वतम्॥ ९२॥
कालाग्नावाहितं घोरे गुह्ये सततगेऽक्षरे।
 
 
अनुवाद
‘मैं भी इस सर्वव्यापी, अविनाशी, अत्यन्त गम्भीर, कालरूपी अग्नि में पड़े हुए संसार को क्षणभंगुर और अनित्य जानता हूँ।॥ 92 1/2॥
 
‘I too know this world, which is omnipresent, indestructible, deep and deep, lying in the fire of black, to be ephemeral and temporary.॥ 92 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)