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पर्व 12: शान्ति पर्व
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अध्याय 227: इन्द्र और बलिका संवाद—काल और प्रारब्धकी महिमाका वर्णन
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श्लोक 92-93h
श्लोक
12.227.92-93h
अहमप्येवमेवैनं लोकं जानाम्यशाश्वतम्॥ ९२॥
कालाग्नावाहितं घोरे गुह्ये सततगेऽक्षरे।
अनुवाद
‘मैं भी इस सर्वव्यापी, अविनाशी, अत्यन्त गम्भीर, कालरूपी अग्नि में पड़े हुए संसार को क्षणभंगुर और अनित्य जानता हूँ।॥ 92 1/2॥
‘I too know this world, which is omnipresent, indestructible, deep and deep, lying in the fire of black, to be ephemeral and temporary.॥ 92 1/2॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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