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mahabharat 12.227.91-92h: हे सत्य के वीर योद्धा! आप धैर्य के कारण कभी व्याकुल नहीं होते। इस सम्पूर्ण जगत को विनाश की ओर जाता देखकर कौन मनुष्य धन, वैभव, विषय-भोग या अपने शरीर पर भी विश्वास कर सकता है? 91 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 12.227: इन्द्र और बलिका संवाद—काल और प्रारब्धकी महिमाका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 227: इन्द्र और बलिका संवाद—काल और प्रारब्धकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक 91-92h
 
 
श्लोक  12.227.91-92h 
ध्रुवं न व्यथसेऽद्य त्वं धैर्यात् सत्यपराक्रम।
को हि विश्वासमर्थेषु शरीरे वा शरीरभृत्॥ ९१॥
कर्तुमुत्सहते लोके दृष्ट्वा सम्प्रस्थितं जगत‍्।
 
 
अनुवाद
हे सत्य के वीर योद्धा! आप धैर्य के कारण कभी व्याकुल नहीं होते। इस सम्पूर्ण जगत को विनाश की ओर जाता देखकर कौन मनुष्य धन, वैभव, विषय-भोग या अपने शरीर पर भी विश्वास कर सकता है? 91 1/2॥
 
'The brave warrior of truth! You certainly don't get distressed because of patience. Seeing this entire world heading towards destruction, which human being can believe in wealth, glory, sensual pleasures or even his own body? 91 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)