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mahabharat 12.227.85-86h: मनुष्य काल का सहारा लेकर उन कर्मों को करके सुखी हो जाता है, परंतु काल का सहारा न मिलने के कारण उन्हीं कर्मों को पुनः करने से वह दुःख का भागी बन जाता है।   |   mahabharat अध्याय 12.227: इन्द्र और बलिका संवाद—काल और प्रारब्धकी महिमाका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 227: इन्द्र और बलिका संवाद—काल और प्रारब्धकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक 85-86h
 
 
श्लोक  12.227.85-86h 
यान्येव पुरुष: कुर्वन् सुखै: कालेन युज्यते॥ ८५॥
पुनस्तान्येव कुर्वाणो दु:खै: कालेन युज्यते।
 
 
अनुवाद
मनुष्य काल का सहारा लेकर उन कर्मों को करके सुखी हो जाता है, परंतु काल का सहारा न मिलने के कारण उन्हीं कर्मों को पुनः करने से वह दुःख का भागी बन जाता है।
 
A man becomes happy by doing those deeds with the support of time, but by doing the same deeds again due to not getting the support of time, he becomes a part of sorrow.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)