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mahabharat 12.227.5-6h: तत्! बुद्धिमान पुरुष सदैव सात्विक भाव का आश्रय लेता है। उसे ही ऐश्वर्य और धैर्य की प्राप्ति होती है तथा वह अपने सभी कार्यों में तत्पर रहता है। 5 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 12.227: इन्द्र और बलिका संवाद—काल और प्रारब्धकी महिमाका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 227: इन्द्र और बलिका संवाद—काल और प्रारब्धकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक 5-6h
 
 
श्लोक  12.227.5-6h 
यच्च प्राज्ञो नरस्तात सात्त्विकीं वृत्तिमास्थित:॥ ५॥
तस्यैश्वर्यं च धैर्यं च व्यवसायश्च कर्मसु।
 
 
अनुवाद
तत्! बुद्धिमान पुरुष सदैव सात्विक भाव का आश्रय लेता है। उसे ही ऐश्वर्य और धैर्य की प्राप्ति होती है तथा वह अपने सभी कार्यों में तत्पर रहता है। 5 1/2॥
 
Tat! An intelligent person always resorts to sattvik attitude. He alone gets opulence and patience and he is diligent in all his deeds. 5 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)