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श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 227: इन्द्र और बलिका संवाद—काल और प्रारब्धकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक 48-49h
 
 
श्लोक  12.227.48-49h 
सवृक्षौषधिरत्नेयं सहसत्त्ववनाकरा॥ ४८॥
तानिदानीं न पश्यामि यैर्भुक्तेयं पुरा मही।
 
 
अनुवाद
इस समय मैं उन लोगों को नहीं देख रहा हूँ, जिन्होंने पहले इस सम्पूर्ण पृथ्वी का, इसके वृक्षों, औषधियों, रत्नों, पशुओं, वनों और खानों सहित, भोग किया है।
 
At this time I do not see those people who have previously enjoyed this entire earth including its trees, medicines, gems, animals, forests and mines.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)