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mahabharat 12.227.45: जिस राजसी लक्ष्मी को तुम 'यह मेरी है' ऐसा समझकर आसक्ति के कारण प्राप्त करना चाहते हो, वह न तुम्हारी है, न हमारी है, न किसी और की है। वह सदा किसी के पास नहीं रहती ॥ 45॥   |   mahabharat अध्याय 12.227: इन्द्र और बलिका संवाद—काल और प्रारब्धकी महिमाका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.227.45 
ममेयमिति मोहात् त्वं राजश्रियमभीप्ससि।
नेयं तव न चास्माकं न चान्येषां स्थिरा सदा॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
जिस राजसी लक्ष्मी को तुम 'यह मेरी है' ऐसा समझकर आसक्ति के कारण प्राप्त करना चाहते हो, वह न तुम्हारी है, न हमारी है, न किसी और की है। वह सदा किसी के पास नहीं रहती ॥ 45॥
 
The royal goddess Lakshmi which you desire to possess out of attachment thinking that 'this is mine' is neither yours nor ours nor anyone else's. She does not remain with anyone forever. ॥ 45॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)