श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 227: इन्द्र और बलिका संवाद—काल और प्रारब्धकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  12.227.33 
पर्यायैर्हन्यमानानां परित्राता न विद्यते।
इदं तु दु:खं यच्छक्र कर्ताहमिति मन्यसे॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
जो काल के मारे हुए हैं, जो स्वयं काल से पीड़ित हैं, उनकी रक्षा कोई नहीं कर सकता। हे शक्र! यह तुम्हारे लिए दुःख की बात है कि तुम स्वयं को इस स्थिति का निर्माता मानते हो।॥33॥
 
No one can protect those who are struck by the passage of time, those who are tormented by time itself. O Sakra! It is a matter of sorrow for you that you consider yourself the creator of this situation. ॥ 33॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)