श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 227: इन्द्र और बलिका संवाद—काल और प्रारब्धकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  12.227.31 
न विद्या न तपो दानं न मित्राणि न बान्धवा:।
शक्नुवन्ति परित्रातुं नरं कालेन पीडितम्॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
न ज्ञान, न तप, न दान, न मित्र, न ही रिश्तेदार काल से पीड़ित मनुष्य को उसके दुख से बचा सकते हैं।
 
Neither knowledge, nor penance, nor charity, nor friends, nor relatives can save a man afflicted by time from his suffering.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)