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mahabharat 12.227.30: माता-पिता की सेवा, देवताओं की पूजा तथा अन्य पुण्यकर्म भी बुरे समय में मनुष्य को प्रिय नहीं लगते ॥30॥   |   mahabharat अध्याय 12.227: इन्द्र और बलिका संवाद—काल और प्रारब्धकी महिमाका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 227: इन्द्र और बलिका संवाद—काल और प्रारब्धकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  12.227.30 
न मातृपितृशुश्रूषा न च दैवतपूजनम्।
नान्यो गुणसमाचार: पुरुषस्य सुखावह:॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
माता-पिता की सेवा, देवताओं की पूजा तथा अन्य पुण्यकर्म भी बुरे समय में मनुष्य को प्रिय नहीं लगते ॥30॥
 
Serving one's parents, worshipping the gods and other virtuous conduct are also not pleasing to a man in bad times. ॥ 30॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)