Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.227.14: राक्षस! शत्रु की समृद्धि देखकर तुम्हें दुःख क्यों नहीं होता? क्या तुम्हें इसलिए दुःख नहीं होता कि तुम्हारा अन्तःकरण पराक्रम से, बड़ों की सेवा से अथवा तप से शुद्ध हो जाता है? यह धैर्य सामान्य मनुष्य के लिए अत्यंत कठिन है। 14॥ | mahabharat अध्याय 12.227: इन्द्र और बलिका संवाद—काल और प्रारब्धकी महिमाका वर्णन । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
दैत्य न व्यथसे शौर्यादथवा वृद्धसेवया।
तपसा भावितत्वाद् वा सर्वथैतत् सुदुष्करम्॥ १४॥
अनुवाद
राक्षस! शत्रु की समृद्धि देखकर तुम्हें दुःख क्यों नहीं होता? क्या तुम्हें इसलिए दुःख नहीं होता कि तुम्हारा अन्तःकरण पराक्रम से, बड़ों की सेवा से अथवा तप से शुद्ध हो जाता है? यह धैर्य सामान्य मनुष्य के लिए अत्यंत कठिन है। 14॥
'Demon! Why don't you feel sad seeing the prosperity of your enemy? Do you not feel sad because your conscience becomes pure through bravery or by serving elders or by penance? This patience is extremely difficult for an ordinary man. 14॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥