श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 227: इन्द्र और बलिका संवाद—काल और प्रारब्धकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक 119
 
 
श्लोक  12.227.119 
द्विजोत्तमै: सर्वगतैरभिष्टुतो
विदीप्ततेजा गतमन्युरीश्वर:।
प्रशान्तचेता मुदित: स्वमालयं
त्रिविष्टपं प्राप्य मुमोद वासव:॥ ११९॥
 
 
अनुवाद
सर्वत्र पहुँचने की शक्ति रखने वाले श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने तेजस्वी, कांतिवान और क्रोधरहित हुए भगवान इन्द्र की स्तुति की; तब इन्द्र शान्त और प्रसन्न होकर स्वर्ग में अपने धाम को जाकर सुख भोगने लगे ॥119॥
 
The best Brahmins, who had the power to reach everywhere, praised Lord Indra who became bright, radiant and free from anger; Then Indra became peaceful and happy and went to his abode in heaven and started experiencing happiness. 119॥
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि बलिवासवसंवादे सप्तविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २२७॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें बलि-वासवसंवादविषयक दो सौ सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २२७॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)