श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 227: इन्द्र और बलिका संवाद—काल और प्रारब्धकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक 110
 
 
श्लोक  12.227.110 
दृष्ट्वा त्वां मम संजाता त्वय्यनुक्रोशिनीमति:।
नाहमेतादृशं बुद्धं हन्तुमिच्छामि बन्धने॥ ११०॥
 
 
अनुवाद
आपको देखकर मेरे हृदय में दया उत्पन्न हो गई है। ऐसे ज्ञानी पुरुष को मैं बन्दी बनाकर मारना नहीं चाहता ॥110॥
 
'Seeing you has filled my heart with compassion. I do not wish to imprison such a wise man and kill him.॥ 110॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)