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mahabharat 12.227.108: आप सर्वत्र विचरण करते हुए भी सर्वथा मुक्त हैं। आपकी कहीं भी आसक्ति नहीं है। आपने अपनी इन्द्रियों को जीत लिया है, इसलिए रजोगुण और तमोगुण आपको स्पर्श नहीं कर सकते॥108॥   |   mahabharat अध्याय 12.227: इन्द्र और बलिका संवाद—काल और प्रारब्धकी महिमाका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.227.108 
विहरन् सर्वतो मुक्तो न क्वचित् परिषज्जते।
रजश्च हि तमश्च त्वां स्पृशते न जितेन्द्रियम्॥ १०८॥
 
 
अनुवाद
आप सर्वत्र विचरण करते हुए भी सर्वथा मुक्त हैं। आपकी कहीं भी आसक्ति नहीं है। आपने अपनी इन्द्रियों को जीत लिया है, इसलिए रजोगुण और तमोगुण आपको स्पर्श नहीं कर सकते॥108॥
 
'You are free from all even though you move everywhere. You have no attachment anywhere. You have conquered your senses; therefore Rajoguna and Tamoguna cannot touch you.॥ 108॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)