श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 227: इन्द्र और बलिका संवाद—काल और प्रारब्धकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक 104-105h
 
 
श्लोक  12.227.104-105h 
ईर्ष्याभिमानलोभेषु कामक्रोधभयेषु च॥ १०४॥
स्पृहामोहाभिमानेषु लोक: सक्तो विमुह्यति।
 
 
अनुवाद
लोग ईर्ष्या, अहंकार, लोभ, काम, क्रोध, भय, कामना, आसक्ति और अहंकार में उलझकर अपनी बुद्धि खो बैठे हैं।
 
‘People have lost their wisdom by getting entangled in jealousy, pride, greed, lust, anger, fear, desire, attachment and pride.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)