श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 227: इन्द्र और बलिका संवाद—काल और प्रारब्धकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक 102-103h
 
 
श्लोक  12.227.102-103h 
सा ते न व्यथते बुद्धिरचला तत्त्वदर्शिनी॥ १०२॥
अहमासं पुरा चेति मनसापि न बुद्धॺते।
 
 
अनुवाद
तुम्हारी बुद्धि निश्चय ही ज्ञानमयी और स्थिर है, इसीलिए वह दुःख नहीं पाती। मैं पहले बहुत समृद्ध था, परन्तु तुम्हें इसका स्मरण भी नहीं है॥102 1/2॥
 
'Your intellect is definitely knowledgeable and stable, that is why it does not suffer. I was very prosperous earlier, but you do not even remember this.॥ 102 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)