श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 227: इन्द्र और बलिका संवाद—काल और प्रारब्धकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक 1-2
 
 
श्लोक  12.227.1-2 
युधिष्ठिर उवाच
मग्नस्य व्यसने कृच्छ्रे किं श्रेय: पुरुषस्य हि।
बन्धुनाशे महीपाल राज्यनाशेऽथवा पुन:॥ १॥
त्वं हि न: परमो वक्ता लोकेऽस्मिन् भरतर्षभ।
एतद् भवन्तं पृच्छामि तन्मे त्वं वक्तुमर्हसि॥ २॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर ने पूछा- हे राजन! जो मनुष्य अपने बन्धु-बान्धवों या राज्य के नाश से महान् क्लेश में पड़ा हो, उसके कल्याण का क्या उपाय है? हे भरतश्रेष्ठ! आप इस संसार में हमारे लिए सर्वश्रेष्ठ वक्ता हैं, इसीलिए मैं आपसे यह प्रश्न पूछ रहा हूँ। कृपया मुझे यह सब बताइए।॥ 1-2॥
 
Yudhishthira asked- O King! What is the solution for the welfare of a person who is in great trouble due to the destruction of his relatives or kingdom? O best of the Bharatas! You are the best speaker for us in this world; that is why I am asking this question from you. Please tell me all this.॥ 1-2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)