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mahabharat 12.226.9: मैं जीवों के उत्थान-पतन को जानता हूँ। मैं श्रेष्ठ सिद्धांतों से भी परिचित हूँ और यह भी जानता हूँ कि ज्ञान से कल्याण होता है, तथापि मैं उसका आचरण नहीं करता। इसके विपरीत, मेरे मन में जो धार्मिक या अधार्मिक आशाएँ उत्पन्न होती हैं, उनके अनुसार मैं अपने कार्य का उत्तरदायित्व वहन करता हूँ। 9॥   |   mahabharat अध्याय 12.226: इन्द्र और नमुचिका संवाद   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 226: इन्द्र और नमुचिका संवाद  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  12.226.9 
भवाभवौ त्वभिजानन् गरीयो
ज्ञानाच्छ्रेयो न तु तद् वै करोमि।
आशासु धर्म्यासु परासु कुर्वन्
यथा नियुक्तोऽस्मि तथा वहामि॥ ९॥
 
 
अनुवाद
मैं जीवों के उत्थान-पतन को जानता हूँ। मैं श्रेष्ठ सिद्धांतों से भी परिचित हूँ और यह भी जानता हूँ कि ज्ञान से कल्याण होता है, तथापि मैं उसका आचरण नहीं करता। इसके विपरीत, मेरे मन में जो धार्मिक या अधार्मिक आशाएँ उत्पन्न होती हैं, उनके अनुसार मैं अपने कार्य का उत्तरदायित्व वहन करता हूँ। 9॥
 
I know the rise and fall of living beings. I am also familiar with the best principles and understand that knowledge leads to welfare, however, I do not implement it. On the contrary, I carry the responsibility of my work according to the inner inspiration that comes with religious or unrighteous hopes in my mind. 9॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)