श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 226: इन्द्र और नमुचिका संवाद  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  12.226.15 
न पण्डित: क्रुद्धॺति नाभिपद्यते
न चापि संसीदति न प्रहृष्यति।
न चार्थकृच्छ्रव्यसनेषु शोचते
स्थित: प्रकृत्या हिमवानिवाचल:॥ १५॥
 
 
अनुवाद
विद्वान पुरुष कभी क्रोध नहीं करता, किसी वस्तु में आसक्त नहीं होता, बुरी वस्तु मिलने पर दुःखी नहीं होता और प्रिय वस्तु मिलने पर हर्षित नहीं होता। वह आर्थिक कष्ट या संकट के समय भी दुःखी नहीं होता; प्रत्युत हिमालय के समान स्वभाव से अविचलित रहता है॥ 15॥
 
A learned man never gets angry, is not attached to anything, is not troubled by sorrow on getting something bad and is not overjoyed on getting something dear to him. He is not sad even in times of financial difficulty or crisis; rather he remains unmoved by nature like the Himalayas.॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)