श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 225: इन्द्र और लक्ष्मीका संवाद, बलिको त्यागकर आयी हुई लक्ष्मीकी इन्द्रके द्वारा प्रतिष्ठा  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  12.225.13 
ब्रह्मण्योऽयं पुरा भूत्वा सत्यवादी जितेन्द्रिय:।
अभ्यसूयद् ब्राह्मणानामुच्छिष्टश्चास्पृशद् घृतम्॥ १३॥
 
 
अनुवाद
पहले वह ब्राह्मणों का हितैषी, सत्यवादी और संयमी था; लेकिन बाद में उसने ब्राह्मणों के प्रति नकारात्मक रवैया अपना लिया और उसने गंदे हाथों से घी को छू लिया।
 
Earlier he was a well-wisher of the brahmins, truthful and self-controlled; but later on he developed a negative attitude towards the brahmins and he touched ghee with unclean hands.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)