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mahabharat 12.224.8: इस गधे जैसे शरीर को पाकर भी मैं असहाय नहीं हूँ। जब मैं शरीर की नश्वरता और आत्मा की अप्रासंगिकता को जानता हूँ, तो इसे जानकर मुझे क्या दुःख हो सकता है?॥8॥   |   mahabharat अध्याय 12.224: बलि और इन्द्रका संवाद, बलिके द्वारा कालकी प्रबलताका प्रतिपादन करते हुए इन्द्रको फटकारना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 224: बलि और इन्द्रका संवाद, बलिके द्वारा कालकी प्रबलताका प्रतिपादन करते हुए इन्द्रको फटकारना  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  12.224.8 
न हीदृशमहं भावमवश: प्राप्य केवलम्।
यदेवमभिजानामि का व्यथा मे विजानत:॥ ८॥
 
 
अनुवाद
इस गधे जैसे शरीर को पाकर भी मैं असहाय नहीं हूँ। जब मैं शरीर की नश्वरता और आत्मा की अप्रासंगिकता को जानता हूँ, तो इसे जानकर मुझे क्या दुःख हो सकता है?॥8॥
 
I am not helpless even after getting this donkey-like body. When I know the impermanence of the body and the irrelevance of the soul, then what pain can I feel knowing this?॥ 8॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)