श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 224: बलि और इन्द्रका संवाद, बलिके द्वारा कालकी प्रबलताका प्रतिपादन करते हुए इन्द्रको फटकारना  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  12.224.48 
गम्भीरं गहनं ब्रह्म महत्तोयार्णवं यथा।
अनादिनिधनं चाहुरक्षरं क्षरमेव च॥ ४८॥
 
 
अनुवाद
वह कालरूप ब्रह्म अनंत जल से भरे हुए सागर के समान अगाध और गहन है। उसका न आदि है, न अंत। उसे क्षर और अक्षर रूप कहा गया है।
 
That time-form Brahma is as deep and profound as an ocean filled with infinite water. It has no beginning or end. It is said to be Kshar and Akshar form.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)