Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 12.224.45: हे शचीदेव इन्द्र! न मैं कर्ता हूँ, न आप कर्ता हैं, न ही कोई दूसरा कर्ता है। काल अपनी इच्छानुसार एक-एक करके समस्त लोकों को ग्रसता है।   |   mahabharat अध्याय 12.224: बलि और इन्द्रका संवाद, बलिके द्वारा कालकी प्रबलताका प्रतिपादन करते हुए इन्द्रको फटकारना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 224: बलि और इन्द्रका संवाद, बलिके द्वारा कालकी प्रबलताका प्रतिपादन करते हुए इन्द्रको फटकारना  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  12.224.45 
नाहं कर्ता न चैव त्वं नान्य: कर्ता शचीपते।
पर्यायेण हि भुज्यन्ते लोका: शक्र यदृच्छया॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
हे शचीदेव इन्द्र! न मैं कर्ता हूँ, न आप कर्ता हैं, न ही कोई दूसरा कर्ता है। काल अपनी इच्छानुसार एक-एक करके समस्त लोकों को ग्रसता है।
 
O lord of Shachi, Indra! Neither I am the doer, nor you are the doer, nor is there anyone else who is the doer. Time consumes all the worlds one by one according to its will.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)