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mahabharat 12.224.43: मैं प्रजा की रक्षा करता था और लुटेरों को लूटता भी था। मैं सदैव प्रजा को दान देता और कर वसूलता था। समस्त लोकों का अधिपति और स्वामी होने के कारण मैं सबको वश में रखता था ॥ 43॥   |   mahabharat अध्याय 12.224: बलि और इन्द्रका संवाद, बलिके द्वारा कालकी प्रबलताका प्रतिपादन करते हुए इन्द्रको फटकारना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 224: बलि और इन्द्रका संवाद, बलिके द्वारा कालकी प्रबलताका प्रतिपादन करते हुए इन्द्रको फटकारना  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  12.224.43 
संरक्षामि विलुम्पामि ददाम्यहमथाददे।
संयच्छामि नियच्छामि लोकेषु प्रभुरीश्वर:॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
मैं प्रजा की रक्षा करता था और लुटेरों को लूटता भी था। मैं सदैव प्रजा को दान देता और कर वसूलता था। समस्त लोकों का अधिपति और स्वामी होने के कारण मैं सबको वश में रखता था ॥ 43॥
 
I used to protect the people and also loot the robbers. I always used to give donations and collect taxes from the people. Being the ruler and lord of all the worlds, I used to keep everyone under control. ॥ 43॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)