श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 224: बलि और इन्द्रका संवाद, बलिके द्वारा कालकी प्रबलताका प्रतिपादन करते हुए इन्द्रको फटकारना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  12.224.4 
प्रीतिं प्राप्यातुलां पूर्वं लोकांश्चात्मवशे स्थितान्।
विनिपातमिमं बाह्यं शोचस्याहो न शोचसि॥ ४॥
 
 
अनुवाद
पूर्वकाल में तुमने सम्पूर्ण लोकों को वश में करके अद्वितीय सुख प्राप्त किया था; किन्तु अब बाह्य जगत में तुम्हारा इतना घोर पतन हो गया है; यह सब सोचकर तुम्हें दुःख होता है या नहीं?॥4॥
 
In the past you had subjugated all the worlds and achieved unparalleled happiness; but now you have suffered such a severe downfall in the external world; do you feel sad thinking about all this or not?॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)