Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.224.21: बहुत सोचने पर भी मैं काल के रचयिता परमात्मा का अंत नहीं देख पा रहा हूँ। उस सागर रूपी काल का कहीं कोई द्वीप नहीं है, फिर उसका दूसरा किनारा कैसे पाया जा सकता है? उसका अंत तो कहीं दिखाई ही नहीं देता।॥21॥ | mahabharat अध्याय 12.224: बलि और इन्द्रका संवाद, बलिके द्वारा कालकी प्रबलताका प्रतिपादन करते हुए इन्द्रको फटकारना । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
बहुत सोचने पर भी मैं काल के रचयिता परमात्मा का अंत नहीं देख पा रहा हूँ। उस सागर रूपी काल का कहीं कोई द्वीप नहीं है, फिर उसका दूसरा किनारा कैसे पाया जा सकता है? उसका अंत तो कहीं दिखाई ही नहीं देता।॥21॥
Even after thinking a lot, I am unable to see the end of the divine creator of time. That ocean-like time has no islands anywhere, then how can one find the other side? Its end is not visible anywhere.॥ 21॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥