श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 224: बलि और इन्द्रका संवाद, बलिके द्वारा कालकी प्रबलताका प्रतिपादन करते हुए इन्द्रको फटकारना  »  श्लोक 2-3
 
 
श्लोक  12.224.2-3 
शक्र उवाच
यत् तद् यानसहस्रेण ज्ञातिभि: परिवारित:।
लोकान् प्रतापयन् सर्वान् यास्यस्मानवितर्कयन्॥ २॥
दृष्ट्वा सुकृपणां चेमामवस्थामात्मनो बले।
ज्ञातिमित्रपरित्यक्त: शोचस्याहो न शोचसि॥ ३॥
 
 
अनुवाद
इन्द्र बोले, "हे दैत्यराज बलि! पहले तो तुम हजारों वाहनों तथा बन्धु-बान्धवों से घिरे हुए सम्पूर्ण जगत को कष्ट देते थे और हमें देवता न मानकर विचरण करते थे। अब अपने बन्धु-बान्धवों द्वारा त्याग दिए जाने पर अपनी दयनीय स्थिति देख रहे हो। इससे तुम्हारे हृदय में दुःख होता है या नहीं?"
 
Indra said, "O King of demons Bali! Earlier you used to trouble the entire world surrounded by thousands of vehicles and brothers and relatives and used to travel without considering us as gods. And now you are seeing your pitiable condition after being deserted by your relatives and friends. Does this cause grief in your heart or not?"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)