श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 222: सनत्कुमारजीका ऋषियोंको भगवत्स्वरूपका उपदेश देना  »  श्लोक d39
 
 
श्लोक  12.222.d39 
न चक्षुषा पश्यति कश्चनैनं
हृदा मनीषा पश्यति रूपमस्य।
इज्यते यस्तु मन्त्रेण यजमानो द्विजोत्तम:॥
 
 
अनुवाद
उस परमात्मा को कोई भी अपनी स्थूल आँखों से नहीं देख सकता। ज्ञानी पुरुष अपने अन्तःकरण में स्थित शुद्ध बुद्धि की सहायता से ही उसके स्वरूप को देख सकता है। उस परमात्मा की पूजा मंत्रों द्वारा की जाती है और केवल श्रेष्ठ ब्राह्मण ही उसकी पूजा करता है।
 
No one can see that Supreme Being with his physical eyes. A wise man can see His form only with the help of the pure intellect situated in his inner heart. That Supreme Being is worshipped by mantras and only the best Brahmin worships Him.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)