Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.222.d19-d20: जब ऋषियों से बात करते हुए विद्वान विभाण्डक ने अपने विषय में यह सब सत्य देखा, तो उन्होंने मन ही मन सोचा और कहा - 'ऋषिवर! आप ऐसा क्यों कह रहे हैं? यदि इसे जानने वाला या न जानने वाला कोई न बचे, तो क्या होगा?' किन्तु उन श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने इसका उत्तर फिर न सुना। वे हँसते हुए आकाश की ओर देखते रहे। | mahabharat अध्याय 12.222: सनत्कुमारजीका ऋषियोंको भगवत्स्वरूपका उपदेश देना । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
ब्रुवन् मुनीन् सत्यमथो निरीक्ष्य
स्वमाह विद्वान् मनसा निगम्य।
ऋषे कथं वाक्यमिदं ब्रवीषि
न चास्य मन्ता न च विद्यते चेत् ॥
न शुश्रुवुस्ततस्तत् तु प्रतिवाक्यं द्विजोत्तमा:।
निरीक्ष्यमाणा आकाशं प्रहसन्तस्ततस्तत:॥
अनुवाद
जब ऋषियों से बात करते हुए विद्वान विभाण्डक ने अपने विषय में यह सब सत्य देखा, तो उन्होंने मन ही मन सोचा और कहा - 'ऋषिवर! आप ऐसा क्यों कह रहे हैं? यदि इसे जानने वाला या न जानने वाला कोई न बचे, तो क्या होगा?' किन्तु उन श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने इसका उत्तर फिर न सुना। वे हँसते हुए आकाश की ओर देखते रहे।
When the learned Vibhandak, while talking to the sages, saw all this truth about himself, he thought to himself and said - 'Rishi! Why are you saying such a thing? If there is no one left who knows or does not know this, then what will happen?' But those great Brahmins did not hear the answer to this again. They kept looking towards the sky while laughing.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥