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स तदाभ्यर्च्य दैत्येन्द्रं त्रैलोक्यपतिरीश्वर:।
असुरेन्द्रमुपामन्त्र्य जगाम स्वं निवेशनम्॥ ३७॥
अनुवाद
इतना ही नहीं, उस समय तीनों लोकों के स्वामी भगवान् इन्द्र ने दैत्यों और दानवों के स्वामी प्रह्लाद की पूजा की और उनकी अनुमति लेकर अपने धाम स्वर्ग को चले गए ॥37॥
Not only this, at that time Lord Indra, the lord of the three worlds, worshipped Prahlada, the lord of demons and devils, and taking his permission, went to his abode, the heavenly abode. ॥ 37॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि शक्रप्रह्रादसंवादो नाम द्वाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २२२॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें इन्द्र और प्रह्रादका संवादनामक दो सौ बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २२२॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४५ १/२ श्लोक मिलाकर कुल ८२ १/२ श्लोक हैं)
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥