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mahabharat 12.222.32: हे इन्द्र! मैं ऊपर (स्वर्ग), नीचे (पाताल) और बीच (मृत्युलोक) के लोकों की इच्छा नहीं करता। ज्ञान, विज्ञान और ज्ञेय के लिए भी मेरे लिए कोई कर्म आवश्यक नहीं है। ॥32॥   |   mahabharat अध्याय 12.222: सनत्कुमारजीका ऋषियोंको भगवत्स्वरूपका उपदेश देना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 222: सनत्कुमारजीका ऋषियोंको भगवत्स्वरूपका उपदेश देना  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  12.222.32 
नोर्ध्वं नावाङ् न तिर्यक् च न क्वचिच्छक्र कामये।
न हि ज्ञेये न विज्ञाने न ज्ञाने कर्म विद्यते॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
हे इन्द्र! मैं ऊपर (स्वर्ग), नीचे (पाताल) और बीच (मृत्युलोक) के लोकों की इच्छा नहीं करता। ज्ञान, विज्ञान और ज्ञेय के लिए भी मेरे लिए कोई कर्म आवश्यक नहीं है। ॥32॥
 
Indra! I do not desire the worlds above (heaven), below (underworld) or in between (mortal world). No action is necessary for me even for the sake of knowledge and science and the knowable. ॥ 32॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)