श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 222: सनत्कुमारजीका ऋषियोंको भगवत्स्वरूपका उपदेश देना  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  12.222.31 
प्रकृतौ च विकारे च न मे प्रीतिर्न च द्विषे।
द्वेष्टारं च न पश्यामि यो मामद्य ममायते॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
प्रकृति और उसके कार्यों से मुझे न तो प्रेम है और न द्वेष। मैं न किसी को अपना शत्रु मानता हूँ, न मित्र। ॥31॥
 
I have neither love nor hatred for nature and its activities. I neither consider anyone as my enemy nor as my friend. ॥ 31॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)