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श्री महाभारत
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पर्व 12: शान्ति पर्व
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अध्याय 222: सनत्कुमारजीका ऋषियोंको भगवत्स्वरूपका उपदेश देना
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श्लोक 27
श्लोक
12.222.27
स्वभावभाविनो भावान् सर्वानेवेह निश्चयात्।
बुद्धॺमानस्य दर्पो वा मानो वा किं करिष्यति॥ २७॥
अनुवाद
समस्त भावनाएँ प्रकृति से उत्पन्न होती हैं। जो यह निश्चित रूप से जानता है, उसे अभिमान या अहंकार कैसे हानि पहुँचा सकता है?॥27॥
All emotions arise from nature. One who knows this for sure, how can pride or arrogance harm him?॥ 27॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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