श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 222: सनत्कुमारजीका ऋषियोंको भगवत्स्वरूपका उपदेश देना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  12.222.17 
यस्तु कर्तारमात्मानं मन्यते साध्वसाधु वा।
तस्य दोषवती प्रज्ञा अतत्त्वज्ञेति मे मति:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य आत्मा को ही अच्छे या बुरे कर्मों का कर्ता मानता है, उसकी बुद्धि दोषयुक्त और सम्यक् ज्ञान से रहित है - ऐसा मेरा मत है ॥17॥
 
He who believes the soul to be the doer of good or bad deeds, his intellect is flawed and devoid of the right kind of knowledge - this is my belief. ॥17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)