vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Apps
About
Contact
श्री महाभारत
»
पर्व 12: शान्ति पर्व
»
अध्याय 222: सनत्कुमारजीका ऋषियोंको भगवत्स्वरूपका उपदेश देना
»
श्लोक 15
श्लोक
12.222.15
स्वभावात् सम्प्रवर्तन्ते निवर्तन्ते तथैव च।
सर्वे भावास्तथाभावा: पुरुषार्थो न विद्यते॥ १५॥
अनुवाद
सब प्रकार के भाव और अभाव स्वाभाविक रूप से आते-जाते रहते हैं। मनुष्य को उसके लिए कोई प्रयत्न नहीं करना पड़ता॥15॥
All kinds of feelings and absences keep coming and going naturally. Man does not have to make any effort for that.॥ 15॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
About Us
|
Contact Us
|
Privacy Policy
|
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×