Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.222.10: तुम्हारी बुद्धि बालक की भाँति राग-द्वेष से रहित प्रतीत होती है। तुम आत्मा का अनुभव करते हो, इसीलिए तुम्हारी ऐसी स्थिति है; अतः मैं तुमसे पूछता हूँ कि इस संसार में आत्मज्ञान का सर्वोत्तम साधन तुम क्या समझते हो?॥10॥ | mahabharat अध्याय 12.222: सनत्कुमारजीका ऋषियोंको भगवत्स्वरूपका उपदेश देना । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
अथ ते लक्ष्यते बुद्धि: समा बालजनैरिह।
आत्मानं मन्यमान: सन् श्रेय: किमिह मन्यसे॥ १०॥
अनुवाद
तुम्हारी बुद्धि बालक की भाँति राग-द्वेष से रहित प्रतीत होती है। तुम आत्मा का अनुभव करते हो, इसीलिए तुम्हारी ऐसी स्थिति है; अतः मैं तुमसे पूछता हूँ कि इस संसार में आत्मज्ञान का सर्वोत्तम साधन तुम क्या समझते हो?॥10॥
‘Your intellect appears to be free from attachment and aversion like that of a child. You experience the Self, that is why you are in such a state; hence I ask you, what do you consider to be the best means of self-knowledge in this world?॥10॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥