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mahabharat 12.221.8: उसे सदैव यज्ञशिष्ट अन्न का भक्षक, अतिथि भक्त, देवता और ब्राह्मणों का भक्त और पूजक होना चाहिए ॥8॥   |   mahabharat अध्याय 12.221: व्रत, तप, उपवास, ब्रह्मचर्य तथा अतिथिसेवा आदिका विवेचन तथा यज्ञशिष्ट अन्नका भोजन करनेवालेको परम उत्तम गतिकी प्राप्तिका कथन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 221: व्रत, तप, उपवास, ब्रह्मचर्य तथा अतिथिसेवा आदिका विवेचन तथा यज्ञशिष्ट अन्नका भोजन करनेवालेको परम उत्तम गतिकी प्राप्तिका कथन  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  12.221.8 
विघसाशी सदा च स्यात् सदा चैवातिथिव्रत:।
श्रद्दधान: सदा च स्याद् देवताद्विजपूजक:॥ ८॥
 
 
अनुवाद
उसे सदैव यज्ञशिष्ट अन्न का भक्षक, अतिथि भक्त, देवता और ब्राह्मणों का भक्त और पूजक होना चाहिए ॥8॥
 
He should always be an eater of Yagyashisht food, a devotee of guests, a devotee and a worshiper of Gods and Brahmins. 8॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)