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mahabharat 12.221.6: हे भरतनन्दन! त्यागी और विनम्र ब्राह्मण सदैव ऋषि और देवता माना जाता है। उसे परिवार के साथ रहते हुए भी सदैव धर्म का पालन करने की इच्छा रखनी चाहिए और निद्रा तथा आलस्य को अपने पास भी नहीं आने देना चाहिए। 6.   |   mahabharat अध्याय 12.221: व्रत, तप, उपवास, ब्रह्मचर्य तथा अतिथिसेवा आदिका विवेचन तथा यज्ञशिष्ट अन्नका भोजन करनेवालेको परम उत्तम गतिकी प्राप्तिका कथन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 221: व्रत, तप, उपवास, ब्रह्मचर्य तथा अतिथिसेवा आदिका विवेचन तथा यज्ञशिष्ट अन्नका भोजन करनेवालेको परम उत्तम गतिकी प्राप्तिका कथन  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  12.221.6 
मुनिश्च स्यात् सदा विप्रो दैवतं च सदा भवेत्।
कुटुम्बिको धर्मकाम: सदास्वप्नश्च भारत॥ ६॥
 
 
अनुवाद
हे भरतनन्दन! त्यागी और विनम्र ब्राह्मण सदैव ऋषि और देवता माना जाता है। उसे परिवार के साथ रहते हुए भी सदैव धर्म का पालन करने की इच्छा रखनी चाहिए और निद्रा तथा आलस्य को अपने पास भी नहीं आने देना चाहिए। 6.
 
O Bharatanandan! A renunciant and humble Brahmin is always considered a sage and a deity. Even while living with his family, he should always have the desire to follow Dharma and should never let sleep and laziness come near him. 6.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)