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mahabharat 12.221.5: उनके मत में त्याग और विनय ही श्रेष्ठ तप हैं। जो मनुष्य इनका पालन करता है, वह सदैव उपवासी और ब्रह्मचारी रहता है। 5॥   |   mahabharat अध्याय 12.221: व्रत, तप, उपवास, ब्रह्मचर्य तथा अतिथिसेवा आदिका विवेचन तथा यज्ञशिष्ट अन्नका भोजन करनेवालेको परम उत्तम गतिकी प्राप्तिका कथन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 221: व्रत, तप, उपवास, ब्रह्मचर्य तथा अतिथिसेवा आदिका विवेचन तथा यज्ञशिष्ट अन्नका भोजन करनेवालेको परम उत्तम गतिकी प्राप्तिका कथन  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  12.221.5 
त्यागश्च संनतिश्चैव शिष्यते तप उत्तमम्।
सदोपवासी च भवेद् ब्रह्मचारी सदा भवेत्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
उनके मत में त्याग और विनय ही श्रेष्ठ तप हैं। जो मनुष्य इनका पालन करता है, वह सदैव उपवासी और ब्रह्मचारी रहता है। 5॥
 
In their opinion, renunciation and humility are the best penance. The person who follows these is always fasting and always celibate. 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)