श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 221: व्रत, तप, उपवास, ब्रह्मचर्य तथा अतिथिसेवा आदिका विवेचन तथा यज्ञशिष्ट अन्नका भोजन करनेवालेको परम उत्तम गतिकी प्राप्तिका कथन  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  12.221.4 
भीष्म उवाच
मासपक्षोपवासेन मन्यन्ते यत् तपो जना:।
आत्मतन्त्रोपघातस्तु न तपस्तत्सतां मतम्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
भीष्म बोले, "हे राजन! जो सामान्य मनुष्य एक मास या पंद्रह दिन तक उपवास करते हैं और उसे तप मानते हैं, उनका यह कृत्य धर्म के साधन शरीर का शोषण है; अतः महापुरुषों के अनुसार वह तप नहीं है।" ॥4॥
 
Bhishma said, "O King! Ordinary people who fast for a month or fifteen days and consider it to be penance, their act is exploiting the body which is a means of religion; hence, according to the great men, it is not penance." ॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)