श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 221: व्रत, तप, उपवास, ब्रह्मचर्य तथा अतिथिसेवा आदिका विवेचन तथा यज्ञशिष्ट अन्नका भोजन करनेवालेको परम उत्तम गतिकी प्राप्तिका कथन  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  12.221.3 
युधिष्ठिर उवाच
यदिदं तप इत्याहुरुपवासं पृथग्जना:।
एतत् तपो महाराज उताहो किं तपो भवेत्॥ ३॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर ने पूछा- महाराज! संसार के सामान्य लोग उपवास को ही तप कहते हैं, क्या यह वास्तव में तप है या कुछ और है? यदि यह कुछ और है, तो उस तप का स्वरूप क्या है?॥3॥
 
Yudhishthira asked- Maharaj! The common people of the world call fasting as penance, is this really penance or something else. If it is something else then what is the nature of that penance?॥ 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)