देवताभिश्च ये सार्धं पितृभिश्चोपभुञ्जते।
रमन्ते पुत्रपौत्रैश्च तेषां गतिरनुत्तमा॥ १७॥
अनुवाद
जो मनुष्य देवताओं और पितरों के साथ बैठकर (अर्थात उन्हें अपना भाग अर्पित करके) भोजन करते हैं, वे इस लोक में अपने पुत्रों और पौत्रों के साथ भोग करते हैं और परलोक में भी परम गति को प्राप्त होते हैं।
Those who eat in the company of the gods and forefathers (i.e. after offering their share to them), they enjoy life with their children and grandsons in this world and they also attain the highest state in the next world.
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि अमृतप्राशनिको नाम एकविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २२१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें अमृतभोजन-सम्बन्धी दो सौ इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २२१॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल १८ श्लोक हैं)
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)