श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 221: व्रत, तप, उपवास, ब्रह्मचर्य तथा अतिथिसेवा आदिका विवेचन तथा यज्ञशिष्ट अन्नका भोजन करनेवालेको परम उत्तम गतिकी प्राप्तिका कथन  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  12.221.13 
भृत्यातिथिषु यो भुङ्‍क्ते भुक्तवत्सु सदा सदा।
अमृतं केवलं भुङ्‍क्ते इति विद्धि युधिष्ठिर॥ १३॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर! जो मनुष्य अपने माता-पिता, कुटुम्बी, सेवक और अतिथियों के भोजन करने के बाद ही भोजन करता है, वह अमृततुल्य भोजन ही करता है; ऐसा समझो॥13॥
 
Yudhishthira! One who eats only after his parents, family members, servants and guests who are capable of supporting him have already eaten, eats only nectar-like food; consider this.॥ 13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)