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mahabharat 12.220.d96: परन्तु सौभाग्य! सांसारिक शब्दों की भाँति वैदिक शब्द भी सार्थक माने जाते हैं, फिर भी वे साक्षात् ईश्वर का बोध कराने में असमर्थ हैं; क्योंकि ईश्वर को वाणी द्वारा अगोचर बताया गया है और उनकी अगोचरता भी तर्कपूर्ण है।   |   mahabharat अध्याय 12.220: श्वेतकेतु और सुवर्चलाका विवाह, दोनों पति-पत्नीका अध्यात्मविषयक संवाद तथा गार्हस्थ्य-धर्मका पालन करते हुए ही उनका परमात्माको प्राप्त होना एवं दमकी महिमाका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 220: श्वेतकेतु और सुवर्चलाका विवाह, दोनों पति-पत्नीका अध्यात्मविषयक संवाद तथा गार्हस्थ्य-धर्मका पालन करते हुए ही उनका परमात्माको प्राप्त होना एवं दमकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक d96
 
 
श्लोक  12.220.d96 
गृह्यन्ते तद्वदित्येव न वर्तन्ते परात्मनि।
अगोचरत्वं वचसां युक्तमेवं तथा शुभे॥
 
 
अनुवाद
परन्तु सौभाग्य! सांसारिक शब्दों की भाँति वैदिक शब्द भी सार्थक माने जाते हैं, फिर भी वे साक्षात् ईश्वर का बोध कराने में असमर्थ हैं; क्योंकि ईश्वर को वाणी द्वारा अगोचर बताया गया है और उनकी अगोचरता भी तर्कपूर्ण है।
 
But good luck! Like worldly words, Vedic words are also considered meaningful, yet they are incapable of giving the understanding of God in person; Because God has been described as imperceptible through speech and His imperceptibility is also logical.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)