श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 220: श्वेतकेतु और सुवर्चलाका विवाह, दोनों पति-पत्नीका अध्यात्मविषयक संवाद तथा गार्हस्थ्य-धर्मका पालन करते हुए ही उनका परमात्माको प्राप्त होना एवं दमकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक d92-d93
 
 
श्लोक  12.220.d92-d93 
सुवर्चलोवाच
अनेन साध्यं किं स्याद् वै शब्देनेति मतिर्मम।
वेदगम्य: परोऽचिन्त्य इति पौराणिका विदु:॥
निरर्थको यथा लोके तद्वत् स्यादिति मे मति:।
निरीक्ष्यैवं यथान्यायं वक्तुमर्हसि मेऽनघ॥
 
 
अनुवाद
सुवर्चला बोली, "भोले ऋषिवर! इस वचन से क्या सिद्ध होगा? मेरा तो यह मानना ​​है कि वचन से न कुछ होने वाला है, न कुछ जाता है। किन्तु पौराणिक विद्वानों का मानना ​​है कि ईश्वर अचिन्त्य है और वेदों से उसे जाना जा सकता है। जिस प्रकार संसार में अनेक शब्द निरर्थक हैं, उसी प्रकार वैदिक शब्द भी निरर्थक हो सकते हैं। मेरे मन में यही विचार आता है; अतः आप इस विषय पर ठीक से विचार करके मुझे सत्य बताइए।"
 
Suvarchala said, "Innocent sage! What is going to be achieved by this word? I believe that nothing is going to happen or go away by words. But Puranic scholars believe that God is inconceivable and can be understood by the Vedas. Just as many words in the world are meaningless, similarly Vedic words can also be meaningless. This is what comes to my mind; so please think properly on this matter and tell me the truth."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)