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mahabharat 12.220.d91: जिस प्रकार प्यासे मनुष्य को जल पीकर तृप्ति मिलती है, उसी प्रकार ब्रह्मबोधक वाक्य का स्मरण करने से साधक को सदैव तृप्ति और पूर्ण ज्ञान प्राप्त होता है तथा उस ज्ञान के माध्यम से उसका सुख क्रमशः बढ़ता जाता है।   |   mahabharat अध्याय 12.220: श्वेतकेतु और सुवर्चलाका विवाह, दोनों पति-पत्नीका अध्यात्मविषयक संवाद तथा गार्हस्थ्य-धर्मका पालन करते हुए ही उनका परमात्माको प्राप्त होना एवं दमकी महिमाका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 220: श्वेतकेतु और सुवर्चलाका विवाह, दोनों पति-पत्नीका अध्यात्मविषयक संवाद तथा गार्हस्थ्य-धर्मका पालन करते हुए ही उनका परमात्माको प्राप्त होना एवं दमकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक d91
 
 
श्लोक  12.220.d91 
तद्वाक्यस्मरणान्नित्यं तृप्तिं वारि पिबन्निव।
प्राप्नोति ज्ञानमखिलं तेन तत् सुखमेधते॥
 
 
अनुवाद
जिस प्रकार प्यासे मनुष्य को जल पीकर तृप्ति मिलती है, उसी प्रकार ब्रह्मबोधक वाक्य का स्मरण करने से साधक को सदैव तृप्ति और पूर्ण ज्ञान प्राप्त होता है तथा उस ज्ञान के माध्यम से उसका सुख क्रमशः बढ़ता जाता है।
 
Just as a thirsty man gets satisfaction by drinking water, in the same way a seeker always gets satisfaction and complete knowledge by remembering Brahmabodhaka sentence and through that knowledge his happiness increases gradually.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)