श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 220: श्वेतकेतु और सुवर्चलाका विवाह, दोनों पति-पत्नीका अध्यात्मविषयक संवाद तथा गार्हस्थ्य-धर्मका पालन करते हुए ही उनका परमात्माको प्राप्त होना एवं दमकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक d87
 
 
श्लोक  12.220.d87 
यानि नामानि गौणानि ह्युपचारात् परात्मनि।
न चक्षुषा न मनसा न चान्येन परो विभु:॥
चिन्त्यते सूक्ष्मया बुद्धॺा वाचा वक्तुं न शक्यते।
 
 
अनुवाद
ईश्वर के गुणों से संबंधित नाम ईश्वर में रूपात्मक हैं। उस सर्वव्यापी ईश्वर को नेत्रों, मन या अन्य किसी भी इंद्रिय से अनुभव नहीं किया जा सकता। उसे शब्दों द्वारा भी वर्णित नहीं किया जा सकता। उसका चिंतन और अनुभव केवल सूक्ष्म बुद्धि द्वारा ही किया जा सकता है।
 
The names related to the qualities of God are formal in God. That omnipresent God cannot be perceived by the eyes, mind or any other senses. He cannot be described by words either. He can be thought of and experienced only by the subtle intellect.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)