श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 220: श्वेतकेतु और सुवर्चलाका विवाह, दोनों पति-पत्नीका अध्यात्मविषयक संवाद तथा गार्हस्थ्य-धर्मका पालन करते हुए ही उनका परमात्माको प्राप्त होना एवं दमकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक d86
 
 
श्लोक  12.220.d86 
आकाशस्याप्यथाकाशं सद्‍रूपमिति निश्चितम्।
तदर्थे कल्पिता ह्येते तत् सत्यो विष्णुरेव च॥
 
 
अनुवाद
वह परमात्मा उस आकाश का भी आकाश है, अर्थात् उसे स्थान देने वाला महाअकाश है; यह निश्चित है, यह सम्पूर्ण जगत् उसी के लिए और उसी के द्वारा रचा गया है। वह सत्य है और सर्वव्यापी है।
 
The Supreme Being is the sky of that sky, i.e. the great space that gives space to it; this is certain, this entire universe has been created for Him and by Him. He is the truth and omnipresent.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)