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mahabharat 12.220.d83: सुवर्चला बोली - तब तो यह मानना ​​पड़ेगा कि जिस प्रकार निराकार, निर्विकार, असीम और सर्वव्यापी आकाश सदैव प्रत्यक्ष है, उसी प्रकार ज्ञानस्वरूप आत्मा भी प्रत्यक्ष है।   |   mahabharat अध्याय 12.220: श्वेतकेतु और सुवर्चलाका विवाह, दोनों पति-पत्नीका अध्यात्मविषयक संवाद तथा गार्हस्थ्य-धर्मका पालन करते हुए ही उनका परमात्माको प्राप्त होना एवं दमकी महिमाका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 220: श्वेतकेतु और सुवर्चलाका विवाह, दोनों पति-पत्नीका अध्यात्मविषयक संवाद तथा गार्हस्थ्य-धर्मका पालन करते हुए ही उनका परमात्माको प्राप्त होना एवं दमकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक d83
 
 
श्लोक  12.220.d83 
सुवर्चलोवाच
निर्विकारं ह्यमूर्तिं च निरयं सर्वगं तथा।
दृश्यते च वियन्नित्यं दृगात्मा तेन दृश्यते॥
 
 
अनुवाद
सुवर्चला बोली - तब तो यह मानना ​​पड़ेगा कि जिस प्रकार निराकार, निर्विकार, असीम और सर्वव्यापी आकाश सदैव प्रत्यक्ष है, उसी प्रकार ज्ञानस्वरूप आत्मा भी प्रत्यक्ष है।
 
Suvarchala said - Then it has to be accepted that just as the formless, formless, limitless and omnipresent sky is always visible, similarly the soul in the form of knowledge is also visible.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)