श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 220: श्वेतकेतु और सुवर्चलाका विवाह, दोनों पति-पत्नीका अध्यात्मविषयक संवाद तथा गार्हस्थ्य-धर्मका पालन करते हुए ही उनका परमात्माको प्राप्त होना एवं दमकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक d80
 
 
श्लोक  12.220.d80 
तस्माद् वामेन वर्तन्ते मनसा भीरु सर्वश:।
यथाकाशगतं विश्वं संसक्तमिव लक्ष्यते॥
 
 
अनुवाद
हे कायर! मनुष्य अपने मोहग्रस्त मन के कारण ही अहंकार आदि शब्दों का प्रयोग करता है। जैसे आकाश में स्थित सम्पूर्ण जगत् उससे आसक्त प्रतीत होता है, वैसे ही ईश्वर में स्थित सम्पूर्ण दृश्य जगत् उससे आसक्त प्रतीत होता है।
 
So coward! Man uses terms like ego etc. due to his delusional mind. Just as the entire world located in the sky appears to be attached to it, in the same way the entire visible world located in God appears to be attached to it.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)