श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 220: श्वेतकेतु और सुवर्चलाका विवाह, दोनों पति-पत्नीका अध्यात्मविषयक संवाद तथा गार्हस्थ्य-धर्मका पालन करते हुए ही उनका परमात्माको प्राप्त होना एवं दमकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक d78
 
 
श्लोक  12.220.d78 
मृण्मये हि घटे भावस्तादृग्भाव इहेष्यते।
अयं भाव: परेऽचिन्त्ये ह्यात्मभावो यथा च तत्॥
 
 
अनुवाद
जिस प्रकार मिट्टी के बर्तन में मिट्टी का भाव होता है, उसी प्रकार ईश्वर से उत्पन्न प्रत्येक पदार्थ में ईश्वर का भाव होता है; अतः अचिन्त्य परब्रह्म परमात्मा में जो अहं भाव है, वही आत्मभाव है और वही वास्तविकता है।
 
Just as there is a sense of earth in an earthen pot, in the same way, there is a sense of God in every substance that comes from God; Therefore, the ego feeling in the unimaginable Parabrahma Paramatma is the self-feeling and that is the reality.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)